पाषाण काल (Stone Age)

भारत-में-प्रारम्भिक-मानव || पाषाण काल Stone Age || पुरापाषाण काल || Paleolithic Era || मध्य पाषाण काल || Mesolithic Era || नवपाषाण काल || Neolithic Era ||

मानव में परिवर्तन

मानव शास्त्रियों के अनुसार आज से लगभग 2 करोड वर्ष पूर्व मानव विकास की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। इस समय मनुष्य में कुछ महत्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन आए जो कि निम्नलिखित हैं-

  • दोनों पैरों पर खड़े होकर सीधे चलना।
  • अंगूठे के कारण वस्तुओं को पकड़ने की क्षमता का विकास होना जिससे महत्वपूर्ण कार्यों को करने में सुगमता।
  • मनुष्य में लंबाई चौड़ाई और गहराई को देखने की क्षमता का होना।

मानव के शारीरिक विकास की यह प्रक्रिया चलती रही तथा उसमें धीरे-धीरे विकास होता गया जैसे कि नीचे के चित्र में स्पष्ट है।

इन महत्वपूर्ण बदलाव के कारण मानव अपने आसपास के वातावरण एवं परिस्थितियों के साथ सामंजस्य करने लगा। अब उसने हाथ एवं मस्तिष्क का अधिक प्रयोग करना सीख लिया था और वह अपनी जरूरतों के लिए पत्थरों के औजारों या उपकरणों का निर्माण करने लगा। इन्हीं पत्थरों के उपकरणों से हमें उसके होने का पता चलता है।


पाषाण काल (Stone Age)

पाषाण अर्थात पत्थर काल (समय) मानव ने अपनी रक्षा और अपनी भूख मिटाने के लिए सर्वप्रथम पत्थर के औजार का ही सबसे अधिक उपयोग किया इसलिए इस युग को पाषाण काल कहते हैं। पाषाण युग के इतिहास का वह काल है जब मानव का जीवन पत्थरों पर ही निर्भर था l जैसे कि पत्थरों का प्रयोग शिकार करने में, रहने के लिए पत्थरों की गुफाएं, आग पैदा करने के लिए पत्थरों का आपस में रगड़ने इत्यादि l पत्थर से बने औजारों में समय-समय पर परिवर्तन हुए इसलिए पाषाण युग को तीन भागों में बांटा गया है। पुरापाषाण काल, मध्य पाषाण काल तथा नवपाषाण काल जो कि मानव इतिहास के आरंभ (20 लाख वर्ष पूर्व) से लेकर कांस्य युग तक फैला माना जाता है l

  • पुरापाषाण काल (Paleolithic Era)
  • मध्य पाषाण काल (Mesolithic Era)
  • नवपाषाण काल (Neolithic Era)

पुरापाषाण काल (Paleolithic Era)

पुरापाषाण काल यह 20 लाख से 12 हज़ार वर्ष पूर्व का समय। इसको भी तीन काल आरंभिक, मध्य तथा उत्तर पुरापाषाण काल में विभाजित किया जाता है l पुरातत्वविदों ने आरंभिक काल को पुरा पाषण काल कहा है, यह नाम पुरास्थलों से प्राप्त पत्थर के औजारों के महत्त्व को बताता है।

पुरापाषाण काल में मानव पहले खुले आकाश के नीचे नदियों के किनारे या झील के पास रहता था। इससे उसे शिकार करने में आसानी होती थी। वह पत्थर के औजारों से पशुओं का शिकार करता था। शिकार से प्राप्त मांस ही उसका मुख्य भोजन था। कंदमूल तथा फल भी उसके भोजन में सम्मिलित थे। थोड़े समय बाद मनुष्य ने गुफाओं में रहना प्रारंभ कर दिया, क्योंकि उसे तब तक घर बनाना नहीं आता था। शिकार की खोज में वह लगातार घूमता रहता था। इस प्रकार उसका कोई स्थाई आवास नहीं था। इसी समय उसे आग की जानकारी प्राप्त हुई। साथ ही अब उसने अपने मृतकों को कब्र में दफनाना प्रारंभ कर दिया। पुरापाषाण काल की आखिरी दौर में उसने चित्र बनाना भी सीख लिया। उस समय की गुफाओं में उसके द्वारा बनाए गए चित्र मिलते हैं। इन चित्रों में शिकार के दृश्य बनाए गए हैं। इसी समय मानव ने हड्डी के औजार भी बनाना प्रारंभ किया। यह औजार उनके ज्ञान में विकास को दर्शाते हैं।
इस युग में मानव झुंड बनाकर ही शिकार करते थे। जिससे वह आपस में बांटकर खाते थे। मानव यह समझ चुका था कि वह तभी जीवित रह सकता है, जब वह दूसरों के साथ मिलकर चले। इस प्रकार एक दूसरे का सहयोग करने की भावना इस युग में विकसित हो चुकी थी। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में मिली कुछ गुफाओं से पता चलता है कि मानव समूह में रहते थे।
कैसे करते थे शिकार?

आदिमानव के पास ना ही जंगली जानवरों जैसे पैने नाखून थे, ना ही नुकीले दांत, ना जबड़े और ना ही सींग। उसकी बड़ी समस्या अपने से ज्यादा ताकतवर जंगली जानवरों से रक्षा करने व उनका शिकार करने की थी। इसके लिए उसने पत्थर के औजारों का निर्माण व प्रयोग किया, क्योंकि उसे पत्थर आसानी से प्राप्त हो जाते थे। यह मानव की आखेटक अवस्था थी।
इस युग के पत्थर के औजार आकृति में सुडोल नहीं थे। यह बेडौल और मुड़े आकृति वाले थे।

आदिमानव ने आग जलाना कैसे सीखा?

औजार बनाने के लिए एक पत्थर पर दूसरे पत्थर से चोट मारते थे। एक पत्थर से दूसरे पत्थर टकराने पर चिंगारी निकली । निकलने वाली चिंगारी से उन्हें आग का ज्ञान हुआ। इससे वह सूखी पत्तियों लकड़ी की टहनियों आदि को जलाने लगे। आग की खोज इस युग की महान उपलब्धि थी।

मध्य पाषाण काल (Mesolithic Era)

मध्यपाषण काल (मेसोलिथ): इसे माइक्रोलिथिक या सूक्ष्मपाषण काल भी कहा जाता है क्योंकि औजारों में लकड़ी या हड्डियों के मुट्ठे लगे होते हैं।

मध्य पाषाण काल के औजार पुरापाषाण काल की अपेक्षा आकार में छोटे हो गए इस समय प्रकृति में अनेक परिवर्तन हुए जिसका प्रभाव मानव जीवन पर पड़ा। नई परिस्थितियों से तालमेल बैठाने के लिए उसने छोटे उपकरण बनाना प्रारंभ किया। जलवायु पहले की अपेक्षा गर्म हुई। फलस्वरुप जहां जहां बर्फ जमी थी वह पिघल गई घास एवं वनस्पतियों के मैदान विकसित हुए। घास को खाने वाले छोटे जानवर जैसे हिरण, खरगोश, भेड़, बकरी आदि पैदा हुए। मानव अपने आप उगी घासों को एकत्र करने लगा। इस गांव में कई आज के अनाजों की पूर्वज थी। इनका प्रयोग मानव ने अपने भोजन में किया। इस प्रकार वह अब संग्राहक बन गया। मानव ने इसी समय कुत्तों को पालतू बनाया। कुत्ता मानव का प्रथम पालतू पशु था।

कैसे हुआ खेती का ज्ञान?

पुरातत्वेत्ताओं का मत है कि अपने आप उगे हुए अनाजों को मानव ने एकत्रित करना शुरू किया। अनाज के कुछ दाने गीली मिट्टी में अथवा इधर-उधर गिरे होंगे। इन स्थानों पर फिर से वही अनाज होगी। जब मानव ने इसे देखा तब उसे ज्ञात हुआ कि इन अनाज के दानों से बार-बार अनाज उगाया जा सकता है। अपने इस ज्ञान का उसने परीक्षण भी किया तब जाकर उसे खेती का ज्ञान हुआ।

नवपाषाण काल (Neolithic Era)

नवपाषाण काल: 10 हज़ार वर्ष पूर्व के बाद का समय को नवपाषाण काल की संज्ञा दी जाती है l

पुरातत्वविदों का यह मानना है कि मानव ने जब से भलीभांति खेती करना प्रारंभ कर दिया तभी से नवपाषाण काल प्रारंभ हुआ। यह मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तन था। खेती के कारण मानव अब भोजन संग्रह के भोजन उत्पादक बन गया। इस समय उसके पत्थर के उपकरण अधिक उपयोगी एवं सुडोल थे, क्योंकि उन्हें अधिक कुशलता से बनाया गया था। यह उपकरण घिसकर चमकदार बनाए गए थे। कुल्हाड़ी एवं हसिया इस समय के महत्वपूर्ण औजार थे। खेती के साथ पशुपालन भी प्रारंभ हुआ। पशुओं का प्रारंभ मांस और दूध प्राप्त करने में किया जाता था। मानव अब अपने खेतों के आसपास मिट्टी के घरों एवं घास फूस के छप्पर वाले घरों में रहने लगा। धीरे-धीरे इस प्रकार बस्तियों से गांव बन गए। इस काल में आदिमानव मिट्टी के बर्तन भी बनाना सीख गए। बर्तनों पर नक्काशी एवं चित्रकारी में रंगों का प्रयोग होने लगा। इसी समय मानव ने पहिए का आविष्कार किया। इसका प्रयोग चाक के रूप में मिट्टी से बर्तन बनाने तथा सामान ढोने के लिए गाड़ी के पहिए के रूप में किया गया। खेती करने के कारण लोग एक ही जगह रहने लगे। फलस्वरुप नए-नए कौशल विकसित हुए। जैसे मुंज की टोकरी व चटाई बनाना, कताई करना, जानवरों के बालों से कपड़ा बनाना आदि। अब उन्हें सामुदायिक जीवन का विकास हुआ। शवों को दफनाने के ढंग से इनके धार्मिक विश्वास के विषय में जानकारी मिलती है। शवों के साथ खाने-पीने की चीजें, बर्तन, हथियार आदि भी दफनाए जाते थे। इन लोगों का विश्वास था कि मरने के बाद भी व्यक्ति इनका उपयोग करेगा।

धातु काल

नवपाषाण युग का अंत होते-होते पत्थर के साथ-साथ धातुओं का इस्तेमाल शुरू हो गया। धातुओं में सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ था। जिसके कारण इस युग को ताम्र पाषाण युग कहा गया। मानव ने तांबे की खानों का पता लगाकर उससे तांबे का प्रयोग हुआ। जिसके कारण इस युग को ताम्र पाषाण युग कहा गया। मानव में तांबे की खानों का पता लगाकर उसे से तांबा खोदकर निकालना शुरू किया। उच्च तापमान में तांबे को पिघलाना तथा तांबे की सहायता से धातु द्रव को विविध रूप देना भी उन्होंने सीख लिए। यह मानव विकास की एक और महत्वपूर्ण खोज थी। धीरे-धीरे मानव ने तांबे और जस्ते को मिलाकर मिश्रित धातु कौन सा बनाना सीख लिया। मानव जीवन उसकी प्रगति एवं संघर्ष की कहानी है। प्रारंभिक मानव ने अपनी समस्याओं से जूझते हुए अपने को जीवित रखा, अपनी उन्नति की एवं अपने को सभ्य बनाया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *