उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)

उपचारात्मक शिक्षण (Remedial Teaching)

उपचारात्मक शिक्षण वास्तव में छात्र ने जो कुछ सीखा है उस को ध्यान में रखकर उसकी उन्नति प्राप्त करने के लिए होता है। इसके अंतर्गत शिक्षक छात्र को अपनी कमजोरियों के क्षेत्र में अधिक योग्यता की दिशा में अग्रसर करता है।

शिक्षा का उद्देश्य मात्र ज्ञान प्रदान करना ही नहीं अपितु बच्चों का सर्वांगीण विकास करना होता है। वर्तमान समय में शिक्षा का जो रूप प्रचलित है वह बाल केंद्रित रूप है। बाल केंद्रित शिक्षण का महत्वपूर्ण लक्ष्य बालकों के व्यवहार में अभीष्ट परिवर्तन होता है। इसके लिए आवश्यक है कि हमारा पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तके, शिक्षण विधियां, क्रियाकलाप, शिक्षण अधिगम सामग्री आदि सबकुछ बच्चों की रुचि आयु व समझ के अनुरूप हो।

विद्यालय में आने वाले बच्चे रूचि, आयु, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक व आर्थिक स्तर, क्षमता व दृष्टिकोण में एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हैं। इस कारण से किसी कक्षा व विषय में उनके सीखने का स्तर भी एक जैसा नहीं रहता है। कुछ बच्चे सब कुछ सीख लेते हैं जबकि कुछ बच्चे प्रयास करने पर भी अपेक्षित गति से सीखने में असमर्थ रहते हैं। सीखने की असमर्थता के कारण धीरे-धीरे यह बच्चे कक्षा के अन्य बच्चों से पिछड़ते जाते हैं। उन्हें सीखने में अनेकों प्रकार की कठिनाई महसूस होती हैं। ऐसे ही बच्चों की कठिनाइयों को दूर करने के लिए शिक्षक उपचारात्मक शिक्षण की सहायता लेता है।

उपचारात्मक शिक्षण का अर्थ (Meaning of Remedial Teaching) :-

शिक्षा जगत में उपचारात्मक शब्द चिकित्सा शास्त्र से लिया गया है जिस प्रकार एक कुशल चिकित्सक विभिन्न प्रकार के परीक्षणों के आधार पर रोगी के रोग तथा रोग के कारणों का पता लगाकर उसकी समुचित चिकित्सा करता है। उसी प्रकार एक कुशल शिक्षक विभिन्न प्रकार की शिक्षण विधियों, परीक्षणों, निरीक्षण व वार्तालाप के आधार पर शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े व कमजोर बच्चों की कठिनाइयों का पता लगाते हैं और उपचारात्मक शिक्षण के द्वारा उनकी कठिनाइयों त्रुटियों को दूर करके उनके सीखने की क्षमता में वृद्धि करते हैं तथा उन्हें सामान्य बालकों के स्तर पर लाने का प्रयास करते हैं।

उपचारात्मक शिक्षण का अभिप्राय उस शिक्षण से है जिसकी व्यवस्था छात्रों की कमियों दुर्बलताओं, अशुद्धियों को दूर करने के लिए की जाती है। उनकी दुर्बलता को जानकर शिक्षा का ऐसा कार्यक्रम बनाया जाता है जिससे उनकी विशिष्ट कठिनाइयों दुर्बलताओं बुरी आदतों व नकारात्मक वृत्तियों को दूर करके सीखने के दुष्प्रभावों को नष्ट किया जा सकता है और गलत ढंग से सीखी गई बातों में सुधार किया जा सकता है। इसके विकासात्मक रूप द्वारा छात्रों की सीखी गई दक्षता और कुशलताओं को और अधिक उत्कृष्टता प्रदान की जा सकती है।

परिभाषाएं :-

योकम व सिम्पसन के अनुसार ” उपचारात्मक शिक्षण उस विधि को खोजने का प्रयत्न करता है जो छात्र को अपनी कुशलता या विचार की त्रुटियों को दूर करने में सफलता प्रदान करें”,।

ब्लायर के अनुसार ” उपचारात्मक शिक्षण का प्रमुख कार्य दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करना इसका मुख्य लक्ष्य है इन दोषों व दोषों के कारणों को खोजना एवं कमजोरियों का निराकरण करना”,।

शिक्षा शब्दकोश के अनुसार ” उपचारात्मक शिक्षण, एक छात्र की कमी निम्न निम्न सामान्य योग्यता के कारण नहीं, को अंशत: अथवा पूर्णता दूर करने के लिए उद्दिष्ट विशेष शिक्षण है”,।

उपचारात्मक शिक्षण निदानात्मक परीक्षण के बाद आता है क्योंकि नैदानिक परीक्षण के द्वारा ही पहले छात्रों की त्रुटियों कठिनाइयों का अधिगम दोषों की जानकारी प्राप्त की जाती है और उसके बाद उपचारात्मक शिक्षण के द्वारा उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता है।

उपचारात्मक शिक्षण का महत्व (importantance of remedial teaching) :-

शिक्षा प्रक्रिया में उपचारात्मक शिक्षण का महत्व निम्नलिखित कारणों से है :-

  • छात्रों की सामान्य व विशिष्ट कठिनाइयों का निराकरण हो जाता है।
  • छात्रों की विषम प्रकरण संबंधित विशिष्ट कठिनाइयों दुर्बलताओं का पता चल जाता है।
  • बालकों की क्षमता को उचित दिशा में मोड़ने में सहायता मिलती है।
  • छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होता है उनमें आत्मविश्वास जागृत होता है।
  • बालकों की व्यक्तित्व संबंधी समस्याओं का निराकरण हो जाता है।
  • शिक्षण रोचक उद्देश्य पूर्ण व प्रभावशाली बनाने में सहायता मिलती है।
  • उपचारात्मक शिक्षण के द्वारा बालकों में आत्मविश्वास जागृत होता है।
  • शिक्षक की प्रवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
  • उपचारात्मक शिक्षण से बालकों को अपने वातावरण से अनुकूलन करने में सहायता मिलती है।
  • छात्रों द्वारा की जाने वाली त्रुटियों में सुधार के साथ-साथ भविष्य में होने वाली त्रुटियों से भी बचाव हो जाता है।

उपचारात्मक शिक्षण के समय ध्यान देने योग्य बिंदु :-

  • उपचारात्मक शिक्षण की व्यवस्था करते समय शिक्षक को निम्नलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।
  • शिक्षण छात्रों की रुचि स्तर व आवश्यकता केंद्रित होना चाहिए।
  • छात्रों की कठिनाइयों की प्रकृति भली-भांति समझ लेना चाहिए कि वह सामान्य है या विशिष्ट
  • शिक्षण सूत्र व शिक्षण सिद्धांतों के आधार पर शिक्षण करना चाहिए
  • अभ्यास कार्य में विविधता होनी चाहिए जिससे कि छात्र उसमें रुचि ले कक्षा में नीरसता न आये
  • व्यक्तिगत विभिन्नता के आधार पर छात्रों को दिए जाने वाले कार्यों में समय-समय पर परिवर्तन किया जाना चाहिए
  • अभ्यास कार्य व अन्य कार्यों का सतत मूल्यांकन किया जाए
  • कार्य या अभ्यास के मूल प्रयोजन की संतुष्टि होनी चाहिए
  • छात्रों को समय-समय पर उनकी प्रगति से अवगत कराया जाना चाहिए l

शिक्षक छात्रों की कठिनाइयों को कैसे जाने?

• कक्षा कार्य या अभ्यास कार्य द्वारा
• गृह कार्य या प्रोजेक्ट कार्य द्वारा
• सत्र परीक्षा के परिणाम के द्वारा
• मासिक/अर्द्ध मासिक / वार्षिक परीक्षाओं के परिणाम द्वारा
• कक्षा में छात्रों से पूछे जाने वाले प्रश्नों के प्राप्त उत्तर द्वारा
• छात्रों के व्यवहार प्रतिक्रियाओं के सतत निरीक्षण अवलोकन द्वारा
• अभिभावकों से साक्षात्कार द्वारा

उपचारात्मक शिक्षण प्रदान करने की विधियां (Method of Providing Remedial Teaching) :-

छात्रों की त्रुटियों की जानकारी होने पर उन्हें दूर करने हेतु शिक्षक द्वारा उपचारात्मक शिक्षण कार्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों प्रकार से किया जा सकता है। छात्रों का वर्गीकरण करके (यह वर्गीकरण मानसिक स्तर व कठिनाइयों के अनुरूप हो सकता है) उनके स्तर के अनुसार अभ्यास कार्य व अन्य क्रियाकलाप कराए जाने चाहिए।

उपचारात्मक शिक्षण को सफल वह प्रभावी बनाने हेतु निम्नलिखित प्रकार के क्रियाकलाप कराए जा सकते हैं :-

  • समूह शिक्षण
  • व्यक्तिगत शिक्षण
  • साधारण अभ्यास कार्य
  • विशिष्ट अभ्यास कार्य
  • समूह चर्चा
  • वाद-विवाद, गोष्ठियों खेल व अन्य गतिविधियों का आयोजन
  • प्रोजेक्ट कार्य
  • गृह कार्य
  • शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग
  • कार्यपुस्तिका का प्रयोग
  • सहपाठी अध्ययन समूह
  • समस्त कार्यों का सतत मूल्यांकन

निष्कर्ष

इस प्रकार से स्पष्ट है कि उपचारात्मक शिक्षण शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इसका समुचित प्रयोग करके शिक्षक अपने कक्षा के शैक्षिक व दृष्टि से पिछड़े व कमजोर बच्चों की कठिनाइयों का पता लगाकर उन्हें दूर कर के छात्रों के सीखने की क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं तथा उनकी क्षमताओं में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

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