महाजनपद

महाजनपद की ओर
जन से जनपद
वैदिक काल में किसी कुल , जनजाती या लोगों के समूह को जन कहा जाता था। प्रत्येक जन का राजा होता था। लगभग 600 ईसा पूर्व में जन का राजा अब जनपद का राजा माना जाने लगा। जनपद का शाब्दिक अर्थ है जन के बसने की जगह अथार्त ऐसा भूखंड जहां कोई जन अपना पांव रखता है अथवा बस जाता है।
महाजनपद
वैदिक कालीन जनपदों ने अपनी अपनी भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपना विकास किया और स्वयं को सुविधा संपन्न बनाया। प्रकृति से प्राप्त संसाधनों जैसे हाथी, लोहा आदि को अपनी सामरिक शक्ति बढ़ाने एवं उपकरण आदि का निर्माण करने में प्रयोग किया। जनपद अपनी शक्ति और सामर्थ्य के आधार पर अधिक महत्वपूर्ण हो गए और महाजनपद के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया। बौद्ध पुस्तक अंगुत्तरनिकाय में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। इन महाजनपदों में 14 राजतंत्र जबकि, दो महाजनपद में गणतंत्र थे।
राजतंत्र महाजनपद :- इनमें राज्य का अध्यक्ष राजा होता था। इस प्रकार के राज्य का विवरण निम्नलिखित है:-
• मगध
• काशी
• कोसल
• वत्स
• चेदि
• कुरु
• पांचाल
• शूरसेन
• मत्स्य
• अवंती
• अश्मक
• गंधार
• कंबोज
गणतंत्र महाजनपद
ऐसे राज्यों का शासन राजा द्वारा ना होकर गण अथवा संघ द्वारा होता था। इस प्रकार के राज्यों का विवरण निम्नलिखित है :-
• वज्जि
• मल
गणतांत्रिक व्यवस्था वाले महाजनपद की राजधानी के रूप में वैशाली का विशिष्ट राजनीतिक महत्व था। यह संपूर्ण वज्जि परिषद का मुख्यालय था। इन 16 महाजनपदों में मगध, कौशल, वत्स एवं अवंती अत्यंत शक्तिशाली थे। अतः यह प्रमुख महाजनपद कहलाए। इनमें भी मगध और अवंती ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।
प्रशासन समाज और लोगों के जीवन में बदलाव
महाजनपद काल में राजा की शक्ति बढ़ गई थी। अब वह एक अति विशिष्ट व्यक्ति बन गया था और वह समाज का रक्षक था। उसका मुख्य कर्तव्य दुश्मनों से प्रजा की रक्षा व राज्य में शांति व्यवस्था कल्याण और न्याय करना था। शासन के कार्य में मदद हेतु अनेक अधिकारी और कर्मचारी भी नियुक्त किए गए।
राजाओं की प्रवृत्ति अपने राज्य को बढ़ाने में थी इसलिए उन्हें बड़ी-बड़ी सेनाएं भी रखनी पड़ती थी। राजा सेना का प्रमुख होता था तथा वह युद्ध में सेना का संचालन करता था। राज्य की आय के लिए प्रजा से कर वसूला जाता था। व्यापार के द्वारा भी आय प्राप्त होती थी। इस समय वस्तुओं की खरीद एवं विक्री रुपयों पैसों द्वारा होने लगी थी। बड़ी बड़ी सड़कों से व्यापार व्यापार में काफी वृद्धि होने लगी थी। ईरान मध्य एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से व्यापारी भारत आते थे। शिल्पकार और व्यापारियों ने व्यापार के विकास के लिए समूह और संगठन भी बनाए थे।
फिर बने शहर
इस युग में पहले की अपेक्षा एक और बड़ा बदलाव देखने को मिलता है, वह था शहरों का विकास। इन शहरों का विकास प्राय: शिल्प केंद्र, व्यापारिक केंद्रों और राजधानी के आसपास हुआ प्रारंभ में कुछ गांव ऐसे थे। जिनमें शिल्प कार्य अधिक विकसित अवस्था में था। धीरे-धीरे यह कुशल शिल्पी एक स्थान पर एकत्र होने लगे थे और यह स्थान गांव एवं शहर के रूप में बदलते गए। इन कुशल शिल्पी ने एक स्थान पर रहकर काम करना इसलिए पसंद किया क्योंकि इन्हें कच्चा माल प्राप्त करने और तैयार की हुई चीजों को बेचने में अधिक सुविधा होती थी। विभिन्न व्यवसायों को पुत्र अपने पिता से सीखता था और व्यवसाय करता था। विभिन्न प्रकार के शिल्प कार्य करने वाले के अलग-अलग वर्ग बन गए। धीरे-धीरे इनका कार्य वंशानुगत हो गया और समाज में अधिक जटिलता एवं कठोरता व्याप्त हो गई।

मगध साम्राज्य
इन छोटे-छोटे राज्यों में एकता का अभाव था। एक राज्य दूसरे राज्य से अधिक शक्तिशाली बनना चाहता था। इस कारण इनमें आपस में संघर्ष होता रहता था। बड़े राज्य छोटे राज्यों को हड़पते चले गए। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। वह अपना साम्राज्य क्षेत्र तथा प्रभाव बढ़ाने के लिए कई तरीके अपनाते थे। जैसे दूसरे राज्यों से मित्रता करना, शादी से रिश्ता बनाना, संधि करना या फिर सीधे आक्रमण करना है। इस प्रकार एक राज्य से दूसरे राज्य में मिलते चले गए। अंत में मगध सबसे शक्तिशाली साम्राज्य हो गया।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व से नंदों के साम्राज्य की स्थापना तक मगध में क्रमशः 3 राजवंशों का शासन हुआ हर्यकवंश, शिशुनागवंश एवं नंदवंश । इनका शासनकाल लगभग 220 वर्षों तक रहा घनानंद नंद वंश का अंतिम शासक था। जिसके शासनकाल में सिकंदर का भारत पर आक्रमण हुआ था। मगध साम्राज्य के शासन ने अपने साम्राज्य के और अधिक विस्तार की नीति अपनाई। उनके पास एक विशाल सेना थी जिस में हजारों घुड़सवार और हाथी भी थे। यही कारण है कि मगध राज्य एक विशाल साम्राज्य बन सका।
साम्राज्य क्या होता है?
जब राजा अपने राज्य की सीमा का अत्यधिक विस्तार कर लेते हैं तो उनके राज्य को साम्राज्य कहा जाता है।

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