आत्मनिरीक्षण विधि (Introspective Method)

आत्मनिरीक्षण विधि :- मस्तिष्क द्वारा अपनी स्वयं की क्रियाओं का निरीक्षण करना आत्मनिरीक्षण विधि कहलाता है l

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परिचय :-

आत्मनिरीक्षण मनोविज्ञान की परंपरागत विधि है l इसका नाम इंग्लैंड के विख्यात दार्शनिक लॉक से संबंध है l जिसने इसकी परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी थी “मस्तिष्क द्वारा अपनी स्वयं की क्रियाओं का निरीक्षण करना आत्मनिरीक्षण कहलाता है” l

पूर्व काल के मनोवैज्ञानिक अपनी मानसिक क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस विधि पर निर्भर थे l वे इसका प्रयोग अपने अनुभवों का पुनः स्मरण और भावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए किया करते थे l वह सुख और दुख, क्रोध और शांति, घृणा और प्रेम के समय अपनी भावना और मानसिक दशाओं का निरीक्षण करके उनका वर्णन करते थे l

आत्मनिरीक्षण का अर्थ :-

Introspection का अर्थ होता है ‘ to look within or Self Observation ‘ जिसका अभिप्राय है अपने आप में देखना या आत्मनिरीक्षण करना l इसकी व्याख्या करते हुए बीएन झा ने लिखा है “आत्म निरीक्षण अपने स्वयं के मन की निरीक्षण करने की प्रक्रिया है यह एक प्रकार का आत्मनिरीक्षण है जिसमें हम किसी मानसिक क्रिया के समय अपने मन में उत्पन्न होने वाले स्वयं की भावनाओं और सब प्रकार की प्रतिक्रियाओं का निरीक्षण विश्लेषण और वर्णन करते हैं”, l

आत्मनिरीक्षण विधि के गुण :-

  • मनोविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि :- डग्लस और हॉलैंड के अनुसार मनोविज्ञान में इस विधि का प्रयोग करके हमारे मनोविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि की है l
  • अन्य विधियों में सहायक :- डग्लस वह हॉलैंड के अनुसार यह विधि अन्य विधियों द्वारा प्राप्त किए गए तथ्यों नियमों और सिद्धांतों की व्याख्या करने में सहायता देती है l
  • यंत्र व सामग्री की आवश्यकता नहीं:- रॉस के अनुसार यह विधि खर्चीली नहीं है क्योंकि इसमें किसी विशेष यंत्र यह सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती l
  • प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं :- यह विधि बहुत सरल है क्योंकि इसमें किसी प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं है रॉस के शब्दों में ” मनोवैज्ञानिक का स्वयं का मस्तिष्क प्रयोगशाला होता है और क्योंकि वह सदैव उसके साथ रहता है इसलिए वह अपनी इच्छा अनुसार कभी भी निरीक्षण कर सकता है”, l

आत्मनिरीक्षण विधि के दोष :-

वैज्ञानिकता का अभाव:- यह विधि वैज्ञानिक नहीं है क्योंकि इस विधि द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा परीक्षण नहीं की जा सकता l

ध्यान का विभाजन :- इस विधि का प्रयोग करते समय व्यक्ति का ध्यान / रहता है, क्योंकि एक और तो उसे मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करना पड़ता है और दूसरी ओर आत्मनिरीक्षण करना पड़ता है l ऐसी दशा में व्यक्ति का ध्यान विभाजित हो जाता है l

मन द्वारा मन का निरीक्षण असंभव है:- इस विधि में मन के द्वारा मन का निरीक्षण किया जाता है, जो कि सर्वथा असंभव है l

मानसिक प्रक्रिया का निरीक्षण असंभव :- डग्लस व हालैंड के अनुसार ” मानसिक दशाओ व प्रतिक्रियाओं में इतनी शीघ्रता से परिवर्तन होते हैं कि उनका निरीक्षण करना प्रायः असंभव हो जाता है” l

मस्तिष्क की वास्तविक दशा का ज्ञान असंभव है :- इस विधि द्वारा मस्तिष्क की वास्तविक दिशा का ज्ञान प्राप्त करना असंभव है l उदाहरण के रूप में यदि किसी मनोवैज्ञानिक को अपने क्रोध का निरीक्षण करना है तो, जैसे ही वह व्यक्ति अपने क्रोध पर ध्यान आकर्षित करता है तो उसका क्रोध क्षण भर में शांत हो जाता है l

असामान्य व्यक्ति व बालकों के लिए अनुपयुक्त विधि :- रॉस के अनुसार यह विधि असामान्य व्यक्तियों, असभ्य मनुष्य, मानसिक रोगियों, बालको और पशुओं के लिए अनुपयुक्त है, क्योंकि उनमें मानसिक क्रियाओं का निरीक्षण करने की क्षमता नहीं होती l

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