गुप्त वंश – गुप्त काल (Gupta Empire)

गुप्त वंश – गुप्त काल (Gupta Empire)

गुप्त काल
दिल्ली में महरौली स्थित लौह स्तंभ में चंद्र नामक शासक की विधियों का वर्णन है। इस चंद्र नामक शासक की पहचान इतिहासकारों ने गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय से करते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज 1600 साल बीत जाने के बाद भी इसमें में जंग नहीं लगा। इससे गुप्त काल के उन्नत प्रौद्योगिकी की अवस्था का पता चलता है।

कुषाण के पश्चात एक नए वंश का उदय हुआ यह राजवंश गुप्त वंश के नाम से जाना जाता है। गुप्त साम्राज्य भारत में लगभग 319-320 ईसवी में स्थापित हुआ l इस राजवंश ने भारत के विशाल भू-भाग पर लगभग 200 वर्षों से अधिक समय तक शासन किया था। गुप्त सम्राटों ने विशाल साम्राज्य स्थापित कर केंद्रीय शक्ति को मजबूत किया और श्रेष्ठ प्रशासन प्रबंध के द्वारा शांति स्थापित की। गुप्त शासकों ने व्यापार साहित्य कला स्थापत्य विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र के विकास को बहुत प्रोत्साहित किया। गुप्त काल में देश धन-धान्य से पूर्णता गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है।

गुप्त वंश:-

गुप्तवंशावली में प्रथम शासक के रूप में श्री गुप्त तथा द्वितीय शासक के रूप में घटोत्कच का नाम मिलता है। यह दोनों ही प्रभावहीन शासक थे। गुप्त साम्राज्य की नींव रखने वाला शासक श्री गुप्त था श्री गुप्त ने 275 ईसवी में गुप्त वंश की स्थापना की थी l इतिहासकारों के अनुसार मौर्य काल के पश्चात भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग गुप्त काल को माना जाता है l इस वंश के प्रथम शक्तिशाली शासक चंद्रगुप्त प्रथम थे। इन्होंने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी l

गुप्त वंश का उदय

श्री गुप्त

गुप्त वंश की नींव रखने वाला श्री गुप्त था l इसने 275 ईसा पूर्व में गुप्त वंश की स्थापना की l पुणे से प्राप्त ताम्रपत्र में श्री गुप्त को आदिराज नाम से संबोधित किया गया है l

घटोत्कच गुप्त

श्री गुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच पुत्र सिंहासन पर बैठा l

चंद्रगुप्त प्रथम

घटोत्कच के पश्चात उसका पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम राज गद्दी पर बैठा l चंद्रगुप्त प्रथम को महाराजाधिराज चंद्रगुप्त के नाम से भी जाना जाता है l गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम को ही कहा जाता है l चंद्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत चलाया था। इसकी रानी का नाम कुमारदेवी था, जो लिच्छवी गणराज्य की राजकुमारी थी। इस वैवाहिक संबंध में गुप्त सत्ता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सर्वप्रथम सिक्कों का चलन भी चंद्रगुप्त प्रथम नहीं किया था l

समुद्रगुप्त

चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना। समुद्रगुप्त 350 ईसा पूर्व के आसपास सिंहासन पर बैठा था l समुद्रगुप्त महान विजेता था। उसे कभी भी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था जो कि पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में स्थित पूर्वी मालवा तक तथा उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक फैला हुआ था l पश्चिमी इतिहासकारों ने समुद्रगुप्त की विस्तार वादी नीति के कारण समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से की थी। समुद्रगुप्त ने आर्यव्रत के 9 शासकों को पराजित कर उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया जबकि दक्षिणपथ के 12 राज्यों को जीतने के बाद उनसे उपहार प्राप्त कर मुक्त कर दिया। विजय प्राप्त करने के बाद समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया तथा अश्वमेघ घोड़ा अंकित मुद्रा को चलाया। समुद्रगुप्त के विजयों का वर्णन प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है। प्रयाग प्रशस्ति की रचना समुद्रगुप्त के राज दरबारी कवि हरिषेण ने की थी, जो इलाहाबाद स्थित अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है।

चंद्रगुप्त द्वितीय :-

समुद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय राजगद्दी पर बैठ। चंद्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य और देवगुप्त के नाम से भी जाना जाता है l चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने लगभग 40 वर्षों तक राज किया था l

विक्रमादित्य के शासन काल को भारतीय कला व साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है l साथ ही यह भारत के इतिहास का भी स्वर्णिम युग था l चंद्रगुप्त द्वितीय ने 400 वर्षों से मालवा व गुजरात में शासन कर रहे शकों को हराया।

शक विजय के उपलक्ष में इन्होंने चांदी के सिक्के चलाए तथा विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। चंद्रगुप्त द्वितीय की प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र थी और दूसरी राजधानी उज्जैनी थी l

प्रसिद्ध कवि कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय के राज दरबार में रहते थे जिसे नवरत्न मे प्रधान माना जाता था l प्रसिद्ध चिकित्सक धनवंतरी भी इनके नौ रत्नों में शामिल थे l धन्वंतरि को चिकित्सा का भगवान कहा जाता था l

कुमारगुप्त प्रथम

चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन पर बैठा कुमारगुप्त प्रथम ने अश्वमेध यज्ञ करवाया था और महेंद्रादित्य की उपाधि धारण की थी l इसीलिए नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना भी की थी

स्कंद गुप्त

कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसका उत्तराधिकारी पुत्र स्कंदगुप्त राज्य सिंहासन पर बैठा l स्कंद गुप्त को लोक हितकारी सम्राट माना गया है l इसने क्रमाआदित्य और विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की थी l स्कंदगुप्त के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य में हूणों ने आक्रमण कर दिया। हूण मध्य एशिया के क्रूर एवं बर्बर जाति के लोग थे। स्कंद गुप्त ने सफलतापूर्वक हूणों को पराजित कर दिया। स्कंदगुप्त ने ही हूणों के आक्रमण से देश को बचाया था l स्कंदगुप्त के समय सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया गया। स्कंदगुप्त के बाद गुप्त वंश के उत्तराधिकारी शासक हूणों के आक्रमण नहीं रोक सके। बुद्धगुप्त के समय से ही गुप्त साम्राज्य विघटित होता चला गया। छठी शताब्दी के आरंभ में गुप्त वंश का अंत हो गया।

गुप्त वंश का अंतिम शासक विष्णुगुप्त था

गुप्त साम्राज्य का विभाजन
साम्राज्य- भुक्ति (प्रान्त)- विषय ( जिला)- विथि (ग्राम)
प्रशासन
गुप्त काल में सम्राट शासन का केंद्र होता था। राजा की सहायता के लिए मंत्री परिषद होती थी जिसके सदस्य को अमात्य कहा जाता था। गुप्त साम्राज्य प्रांत में विभाजित था। प्रांत के प्रमुख को उपरीक कहा जाता था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी। गुप्त काल में राज्य के अधिकारियों को नगद वेतन के स्थान पर भूमि दी जाती थी। प्राचीन काल से चली आ रही राजस्व प्रणाली का अनुसरण किया गया। सामान्यता कुल उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था।
धर्म
गुप्त शासक वैष्णव धर्म अनुयाई थे। इन्होंने परमभागवत की उपाधि धारण की। गुप्त शासकों का राजकीय चिन्ह गरुड़ था।
गुप्त साम्राज्य की उपलब्धियां
संगीत :- गुप्त सम्राट संगीत प्रेमी थे। कुछ सिक्कों पर वीणा बजाते हुए सम्राट समुद्रगुप्त का चित्र अंकित है।
कला:- स्थापत्यकला, मूर्ति कला और चित्रकला इस युग की महान दिन है। धूसरा नामक स्थान पर शिव मंदिर का चबूतरा और शिवलिंग ही शेष रह गए हैं। गुप्तकालीन मंदिर का सर्वोत्तम उदाहरण देवगढ़ का दशावतार मंदिर है। मूर्तियां हिंदू, वैष्णव, शैव, बौद्ध, जैन आदि सभी धर्मों से संबंधित है। मूर्तियों का निर्माण सफेद बलुआ पत्थरों से हुआ है। गुप्त काल में विशेष प्रकार के पत्थरों के स्तंभ बनाए जाते थे।
साहित्य
गुप्त काल में साहित्य के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई। चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में साहित्य के नवरत्न थे। इनमें कालिदास प्रसिद्ध थे। कालिदास ने अभिज्ञान शकुंतलम रघुवंश कुमारसंभव आदि महान ग्रंथों की रचना की। इसी काल में विष्णु गुप्त ने महान पंचतंत्र की रचना की जिसमें लिखी हुई कहानियां बच्चों को सूझ बूझ की जानकारी देती है और महाभारत को भी इसी से में अंतिम रूप दिया गया।
विज्ञान
गुप्त काल में विज्ञान के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई। इस काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी गोल है और सूर्य का चक्कर लगाती है। इन के सम्मान में ही भारत का प्रथम कृत्रिम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया।
वराहमिहिर चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के दरबार में नवरत्नों में से एक थे। वराहमिहिर प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने बताएं कि कोई शक्ति ऐसी है जो चीजों को जमीन के साथ बांधे रखती है और आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। महरौली में स्थित लौह स्तंभ वैज्ञानिक प्रगति का एक बेजोड़ नमूना है।

फाहियान के अनुसार गुप्त काल की सामाजिक स्थिति
विदेशी यात्री फाह्यान चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय भारत आया। उसने लिखा कि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन बहुत अच्छा था। इसलिए समय में प्रजा सुखी और धनी थी। लोग स्वतंत्र पूर्वक व्यवसाय करते थे। धर्मशाला में अतिथियों के लिए समुचित व्यवस्था की गई थी। राज्य में चोरी का नाम नहीं सुना था। इसने पाटलिपुत्र में एक विशाल चिकित्सालय देखा। चिकित्सालय में रोगियों को मुफ्त दवा और इलाज देने की व्यवस्था थी। नगर में अनेक संस्थाएं थी, जहां दीन दुखियों की मदद की जाती थी। गुप्त काल के लोग दानी और दयालु प्रवृत्ति के थे। गुप्त काल में लोग लहसुन , प्याज, मांस का सेवन नहीं करते थे हुए अहिंसा को सत्यवादी थे।

गुप्त वंश कितने वर्ष शासन किया
• चंद्रगुप्त प्रथम 319 ईस्वी से 335 ईसवी तक
• समुद्रगुप्त 335 ईसवी से 375 ईसवी तक
• चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य 375 ईस्वी से 414 ईसवी तक
• कुमारगुप्त प्रथम 414 ईस्वी से 455 ईसवी तक
• स्कंद गुप्त 455 ईसवी से 465 ईसवी तक
• बुद्धगुप्त अंतिम शासक

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