प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी (First Generation learners)

प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी | First generation learners | प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी कौन होते है? |

प्रथम पीढ़ी के बालक ऐसे परिवारों से संबंधित होते हैं l जिनके माता-पिता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षक पूरी नहीं की होती है। इन बालको को वंचित वर्ग के शिक्षार्थी भी कहते है क्योंकि आर्थिक – सामाजिक आधार से यह बालक बहुत कमजोर होते हैं इसलिये शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ जाते है l इन्हे वंचित वर्ग के बालक के नाम से संबोधन किया जाता है l

प्रथम पीढ़ी अथवा वंचित वर्ग के शिक्षार्थी उनकी समस्याएं व समाधान (First generation learners and their problems and solutions)|

  • Pratham pidhi के शिक्षार्थी की विशेषता क्या होती है?
  • यह बच्चे ऐसे परिवारों से संबंधित होते हैं जिनके माता-पिता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षक पूरी नहीं की होती है।
  • ऐसे विद्यार्थियों को स्वतंत्र अध्ययन में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • ऐसे बच्चों के परिवार आमतौर पर निरक्षर होते हैं।
  • शिक्षण प्रक्रिया में सामंजस्य बिठाना इनके लिए कठिन होता है।
  • ऐसे बच्चे मुख्यतः सुविधा वंचित समूह में रहते हैं।
  • शिक्षण प्रक्रिया इन के लिए कठिन होती है।
  • सीखने की प्रक्रिया में इन बालकों को परिवार से कोई विशेष सहयोग नहीं मिल पाता।
  • परिवार से सहयोग न मिलने के कारण यह सामान्य बच्चों की तुलना में अधिगम प्रक्रिया में पिछड़ जाते हैं। First generation learners
  • सामाजिक व आर्थिक परिवेश पिछड़ा होने के कारण लड़कियों की विद्यालय छोड़ने की दर सर्वाधिक होती है।
  • यह शिक्षार्थी विचारों को अभिव्यक्त करने में झिझकते है।
  • इस प्रकार के बच्चों में आत्मविश्वास की कमी पाई जाती है।
  • यह शिक्षार्थी दूसरों को अपना मित्र बनाने में संकोच करते है
  • इन बच्चो के पारिवारिक एवं विद्यालय परिवेश में अंतर होने कारण इन्हें दोनों परिवेश में सामंजस्य बिठाने में काफी कठिनाई होती है।
  • शिक्षक के द्वारा दिन उनके प्रति अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
  • अक्सर स्कूलों में इनकी बेज्जती होती है।
  • प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने से पूर्व बहुत से विद्यार्थी विद्यालय छोड़ देते हैं।

प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी के शिक्षण प्रक्रिया में सामान्य से स्थापित ना कर पाने के कारण क्या है?

  • पिछड़ा सामाजिक परिवेश।
  • विद्यालयों में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी।
  • शिक्षको द्वारा अपनी भूमिका का ईमानदारी से निर्वहन ना करना तथा विद्यालय से अनुपस्थित रहना।
  • आदिवासी क्षेत्रों के विद्यालयों में नामांकन से पूर्व बालकों का नाम बदल दिया जाता है। इससे बालक की पहचान पर आघात होता है l वह विद्यालय छोड़ देता है।
  • बच्चों को प्रश्न पूछने से निरुत्साहित करना।
  • बच्चों शारीरिक दंड प्रदान करना
  • ऐसे बालकों का सामान्य बालकों द्वारा उपहास करना
  • शिक्षण प्रक्रिया में ऐसे बालकों को परिवार का सहयोग प्राप्त ना होना।
  • शिक्षकों को शिक्षार्थियों के सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश का ज्ञान न होना।
  • शिक्षक द्वारा शारीरिक दंड का प्रयोग करना l

प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी के लिए शिक्षण प्रक्रिया में संबंध स्थापित करने के लिए सुझाए गए उपाय निम्नलिखित हैं:-

  • विद्यार्थियों के सांस्कृतिक एवं सामाजिक ज्ञान को प्रतिदिन के शिक्षण कार्य से जोड़ना।
  • छात्र में प्रेम विश्वास एवं आत्मीयता विकसित करना।
  • शिक्षण प्रक्रिया में प्रत्येक बालक की सहभागिता करना l
  • शिक्षण की भाषा सरल होनी चाहिए ऐसे बालकों में पिछड़े प्रवेश होने के कारण भाषा संबंधित विकास पर्याप्त नहीं होता।
  • शिक्षण प्रक्रिया में प्रत्येक बालक को महत्व देना
  • शिक्षण की भाषा बालक के आम जीवन से संबंधित होने चाहिए।
  • शिक्षक द्वारा शिक्षण में विविधतापूर्ण सांस्कृतिक उदाहरणों एवं अनुभव का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे ऐसा शिक्षण में बहुत शिक्षण प्रक्रिया से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे।
  • छात्रों के बुनियादी शिक्षा पर बल दिया जाना चाहिए।
  • योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए।
  • ऐसे विशिष्ट बालकों को उनकी विशेषता का एहसास ना होने देना चाहिए।
  • आज के शिक्षकों को विविधतापूर्ण परिवेश में शिक्षण प्रक्रिया जुड़ने का अवसर मिलना चाहिए । इस अवसर का सदुपयोग करते हुए उन्हें अपने शैक्षिक गतिविधियों में प्रत्येक बच्चे के अनुभव को पिरोने का प्रयास करना चाहिए। जिससे शिक्षा का ज्ञान निश्चित होगा।

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