बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र

बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र | बाल विकास क्या है | बाल विकास का अध्ययन किस शाखा में किया जाता है | bal vikas in hindi | bal vikas | bal vikas ka arth

बाल विकास क्या है? शिक्षा मनोवैज्ञानिको और बाल मनोवैज्ञानिको के मन में यह प्रश्न अक्सर उठता रहता है। इस प्रश्न के अर्थ को जानने से पहले हम बात करते हैं विकास की विकास क्या है? विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया होती है जो संसार के प्रत्येक जीवो में पाई जाती है।

विकास की यह प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु पर्यंत तक किसी न किसी रूप में अवश्य चलती रहती है। मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत किया जाता है उस शाखा को बाल मनोविज्ञान कहा जाता है। परंतु अब मनोविज्ञान की इस शाखा को बाल विकास कहा जाने लगा है। मनोविज्ञान की इस नवीन शाखा का विकास पिछले 50 वर्षों में सर्वाधिक हुआ है।

वर्तमान समय में बाल विकास के अध्ययनों में मनोवैज्ञानिकों की रुचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है क्योंकि इस दिशा में हुए अध्ययनों ने बालकों के जीवन को सुखी – समृद्धिशाली और प्रशंसनीय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

बाल विकास का क्या अर्थ है?

बाल विकास मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में विकसित हुआ है। इसके अंतर्गत बालकों के व्यवहार, स्थितियां, समस्याओं तथा उन सभी कारणों का अध्ययन किया जाता है जिनका प्रभाव बालक के व्यवहार पर पड़ता है। वर्तमान युग में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक कारक मानव तथा उसके परिवेश को प्रभावित कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप बालक, जो भविष्य की आधारशील होता है l वह भी इन सभी से प्रभावित होता है।

बाल मनोविज्ञान की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं :-

क्रो और क्रो के अनुसार :- “, बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारंभ से किशोरावस्था की प्रारंभिक अवस्था तक करता है”,।

जेम्स ड्रेवर के अनुसार- “, बाल मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्व अवस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता है”,।

थॉम्पसन के शब्दों में- “, बाल मनोविज्ञान सभी को एक नई दिशा में संकेत करता है यदि उसे उचित रूप में समझा जा सके तथा उसका उचित समय पर उचित ढंग से विकास हो सके तो प्रत्येक बालक एक सफल व्यक्ति बन सकता है”, ।

हरलॉक के अनुसार – “, आज बाल विकास में मुख्यत: बालक के रूप, व्यवहार, रुचियां, और लक्ष्य में होने वाले उन विशिष्ट परिवर्तनों की खोज पर बल दिया जाता है जो उसकी एक विकासात्मक अवस्था से दूसरी विकासात्मक अवस्था में पदार्पण करते समय होते हैं बाल विकास में यह खोज करने का भी प्रयास किया जाता है कि यह परिवर्तन कब होते हैं इसके क्या कारण है और यह व्यक्तिक है या सर्वभौमिक हैं”,।

बाल विकास की आवश्यकता :-

बाल विकास के क्षेत्र में गर्भधारण अवस्था से युवा अवस्था तक के मानव के सभी व्यवहार संबंधी समस्याएं सम्मिलित की जाती हैं। इस अवस्था के सभी मानव व्यवहार संबंधित समस्याओं के अध्ययन में विकासात्मक दृष्टिकोण मुख्य रूप से अपनाया जाता है। इन अध्ययनों में मुख्य रूप से इस बात पर बल दिया जाता है कि विभिन्न विकास अवस्थाओं में कौन-कौन से क्रमिक परिवर्तन होते हैं। यह परिवर्तन किन कारणों से कब और क्यों होते हैं आदि ।

बाल विकास विषय के क्षेत्र के अंतर्गत निम्नलिखित समस्याओं तथा विषय सामग्री का अध्ययन किया जाता है :-

वातावरण और बालक :- बाल विकास में इस समस्या के अंतर्गत दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। प्रथम यह कि बालक का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है? दूसरा यह कि वातावरण बालक के व्यवहार, व्यक्तित्व तथा शारीरिक विकास आदि को किस प्रकार प्रभावित करता है? अतः स्पष्ट है कि बालक का पर्यावरण एक विशेष प्रभावकारी क्षेत्र है।

बालकों की व्यक्तिक विविधताओं का अध्ययन :- बाल विकास में व्यक्तिक विभिन्नता व तथा इससे संबंधित समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यक्तिगत भेदों की दृष्टि से निम्नलिखित तथ्यों का अध्ययन किया जाता है जैसे :- शरीर रचना संबंधी भेद, मानसिक योग्यता संबंधी भेद, सामाजिक व्यवहार संबंधी भेद, व्यक्तित्व संबंधी भेद तथा भाषा विकास संबंधी भेद।

मानसिक प्रक्रियाएं :- बाल विकास में बालक की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है। जैसे प्रत्यक्षीकरण, सीखना, कल्पना, स्मृति, चिंतन, सहचार्य इत्यादि इन सभी मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन दो समस्याओं के रूप में किया जाता है। प्रथम यह की विभिन्न आयु स्तरों पर बालक की विभिन्न मानसिक प्रक्रिया किस रूप में पाई जाती हैं, इनकी क्या गति है? तथा दूसरा यह कि इन मानसिक प्रक्रियाओं का विकास कैसे होता है तथा इनके विकास को कौन से कारक प्रभावित करते हैं?

बालक-बालिकाओं का मापन:- बाल विकास के क्षेत्र में बालकों की विभिन्न मानसिक और शारीरिक मापन तथा मूल्यांकन से संबंधित समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है। मापन से तात्पर्य है कि इन क्षेत्रों में उसकी समस्याएं क्या है? और उसका निराकरण कैसे किया जा सकता है?

बाल व्यवहार और अंत:क्रियाएं :- बाल विकास के अध्ययन क्षेत्र में अनेक प्रकार की अन्य क्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है। बालक का व्यवहार गतिशील होता है तथा उसकी विभिन्न शारीरिक और मानसिक योग्यता और विशेषताओं में क्रमिक विकास होता रहता है। अतः स्वाभाविक है कि बालक और उसके वातावरण में समय-समय पर अंत:क्रियाएं होती रहती हैं।

समायोजन संबंधित समस्याएं :- बाल विकास में बालक के विभिन्न प्रकार के समायोजन समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है। साथ ही इस समस्या का अध्ययन किया जाता है कि भिन्न-भिन्न समायोजन क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न आयु स्तरों पर बालक का क्या और किस प्रकार का समायोजन है? इस क्षेत्र में कुसमायोजित व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है।

विशिष्ट बालकों का अध्ययन :- जब बालक की शारीरिक और मानसिक योग्यता और विशेषताओं का विकास दोषपूर्ण ढंग से होता है तो बालक के व्यवहार और व्यक्तित्व में असमान्यता के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। बाल विकास में इन विभिन्न असमानता और इसके कारणों और गतिशीलता का अध्ययन होता है। विशिष्ट बालक की श्रेणी में निम्नलिखित बालक आते हैं शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहने वाले बालक, पिछड़े बालक, अपराधी बालक एवं समस्यात्मक बालक इत्यादि।

अभिभावक बालक संबंध :- बालक के व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में अभिभावकों और परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अभिभावक बालक संबंध का प्रभाव बालक के विकास पर पड़ता है।

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