बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म

बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म | छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व का भारत ( धार्मिक आंदोलन) |

बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का उदय होने के कारण

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में छोटे-छोटे जनपद बड़े राज्य बनने की होड़ में संघर्ष करते रहे थे। इससे प्रजा अपने को असुरक्षित महसूस करने लगी थी। पुराने समय में जन के लोग एक दूसरे की मदद एवं आपस में भरोसा करते थे। ऐसी बातें अब समाप्त हो चली थी। अब ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लालच में लोग एक दूसरे से झूठ बोलने , एक दूसरे को ठगने वालों का देने लगे थे।

सिंधु सभ्यता के बाद छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में जाकर पुनः नगरों का विकास हुआ। इससे पहले की संस्कृतिया ग्रामीण संस्कृतिया थी। इसे इतिहास में द्वितीय नगरीकरण के नाम से जानते हैं। वैदिक काल के अंत तक धार्मिक क्रियाकलाप धीरे-धीरे कठोर एवं खर्चीली होते गए। अब यज्ञों में पशुओं की बलि भी दी जाने लगी थी। चमत्कार और ढोंग ढकोसला का बोलबाला हो गया था। वेदों की संस्कृत भाषा जनसामान्य के समझ में नहीं आती थी। वर्ण व्यवस्था अब कठोर जाति व्यवस्था का रूप ले चुकी थी। पुरोहितों के द्वारा पूरे समाज को ऊंची तथा नीची जाति में विभाजित कर दिया गया था। इन कारणों से समाज में पूर्णत: असंतुलन की स्थिति आ गई थी। ऐसी बदलती परिस्थितियों में लोगों के विचारों में बड़े बड़े बदलाव आ रहे थे।

सभी के मन में तरह-तरह के बदलाव उठ रहे थे जैसे कि :-

  • यज्ञ क्यों करना चाहिए? क्या चढ़ावा चढ़ाने से मोक्ष प्राप्त होते हैं?
  • क्या वास्तव में सब कुछ पूर्व निश्चित है तथा ईश्वर ने तय किया है? क्या अपनी स्थिति बदली नहीं जा सकती?
  • ऐसा क्या है जो कभी नहीं मरता? मरने के बाद क्या होता है? क्या तपस्या करने से तपस्वी अमर हो जाते हैं?

इन जिज्ञासाओं के लिए उन दिनों कई लोग जंगलों में आश्रम बनाकर रहते थे। उन आश्रमों में वे तरह-तरह के प्रश्नों पर चिंतन मनन करते थे। वहां आने वाले से चर्चा करते थे और अपने पास बैठा कर दूसरों को सिखाते थे। जो लोग आश्रमों में रहते थे वह ऋषि, मुनि कहलाते थे। इन ऋषियों ने मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में चिंतन कर बताया कि आत्मा या ब्रह्म कभी भी नष्ट नहीं होती है। आत्मा बार-बार जन्म लेती है। कठोर तपस्या के द्वारा ही इसका ज्ञान होता है। आत्मा जब ब्रह्म से मिल जाती है तब मानव को संसार के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। आत्मा का ज्ञान ही परम ज्ञान है। ऋषियों के यह विचार उपनिषदों में मिलते हैं।
ऋषि मुनियों के अलावा कुछ और लोग भी ज्ञान की खोज में लगे थे जो एक स्थान पर नहीं रहते थे। कई राजा भी इन्हीं ऋषियों की तरह चिंतन में आ गए थे। वह घर त्याग कर, गांव-गांव , जंगल-जंगल, नगर-नगर घूमते रहते थे। ऐसे लोगों में महावीर और गौतम बुध बहुत प्रसिद्ध हुए।

बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म

गौतम बुध:-

महात्मा बुध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे इनका जन्म ईसा से 563 वर्ष पूर्व नेपाल में कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन था। वे शक्य गणराज्य के राजा थे। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सच्चे ज्ञान और शक्ति की खोज के लिए महात्मा बुध काफी दिनों तक कठिन तपस्या की , परंतु उनको इससे शारीरिक कष्ट ही हुआ और उन्होंने इस रास्ते को छोड़ दिया। वह बहुत दिनों तक बिहार प्रांत के गया नामक स्थान पर विषयों के साथ पहुंचे जहां उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। महात्मा बुद्ध ने मध्यम मार्ग यानी बीच का रास्ता अपनाने की शिक्षा दी जिसका अर्थ होता है ना तो विलासिता और ना तो अधिक कठोर तप ।

गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्य को बताया :-

  1. दुख
  2. दुख का कारण
  3. दुख दूर करने का उपाय भी है
  4. दुखों को दूर करने का उपाय अष्टांगिक मार्ग है l


महात्मा बुध के द्वारा अष्टांगिक मार्ग सरल मानवतापूर्ण व्यवहार के नियम निम्नलिखित हैं :-

  1. जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सही सोच होना
  2. सही बात और कार्य करना
  3. सत्य बोलना
  4. अच्छा कार्य करना
  5. अच्छे कार्य द्वारा जीविका अर्जित करना
  6. मानसिक और नैतिक उन्नति के लिए प्रयास करना
  7. अपने कार्य व्यवहार पर हमेशा नजर रखना
  8. ज्ञान प्राप्ति के लिए ध्यान केंद्रित करना

महात्मा बुद्ध ने दुख से छुटकारा पाने को निर्वाण कहा है। उनके उपदेशों से मानव सोच में बहुत बड़ा बदलाव आया है। उनके उपदेश सरल पाली भाषा में थे। उन्होंने बताया कि इस व्यक्ति का अच्छा या बुरा हो ना उसके व्यवहार पर निर्भर करता है ना की उसकी जाति पर। गौतम बुध के निर्माण के कुछ शताब्दियों बाद उनके बौद्ध अनुयाई दो संप्रदायों में विभाजित हो गए। हीनयान और महायान

वर्धमान महावीर :-

महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। इनके बचपन का नाम वर्तमान था l इनका जन्म एक राज परिवार में वैशाली वर्तमान में बिहार राज्य के निकट 540 ईसा पूर्व में हुआ था। सत्य और शांति की खोज में उन्होंने कठोर तप करने का मार्ग अपनाया। 30 वर्ष की अवस्था में घर छोड़कर कठिन तपस्या की और अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण वे महावीर और जीन अथवा विजेता कहलाए। स्वयं ज्ञान प्राप्त करने के करने के बाद दूसरों की भलाई के लिए उन्होंने अपने सिद्धांतों का प्रचार प्राकृत भाषा में किया जो उस समय आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी महावीर स्वामी के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा लक्ष्य जन्म मरण के चक्कर से मुक्त होकर केवल मोक्ष प्राप्त करना होना चाहिए। ऋषभदेव जैन धर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थकर थे l

जीवन के विकास के लिए उन्होंने मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहकर तीन बातों को मानने पर विशेष बल दिया
• सही बातों में विश्वास
• सही बातों को ठीक से समझना
• उचित कर्म
जैन धर्म में इन्हें त्रिरत्न या तीन रतन कहते हैं। महावीर स्वामी ने अच्छे व्यवहार व आचरण के लिए पांच महाव्रत ओं का पालन करने के लिए कहा।

यह पांच महाव्रत निम्नलिखित प्रकार के थे:-

  1. जीवो को ना मारना
  2. सच बोलना
  3. चोरी ना करना
  4. अनुचित धन न जुटाना
  5. इंद्रियों को वश में रखना

महावीर स्वामी के कैवलस्य लगभग 2 शताब्दियों के बाद उनके जैन अनुयायियों दो संप्रदायों में बट गए स्वेततांबर और दिगंबर l श्वेतांबर सफेद वस्त्र पहनने वाले थे जबकि दिगंबर यह निर्वस्त्र रहने वाले थे।

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